शब्द-सामर्थ्य और यथार्थ
आकलन, सामग्री और ब्रांडिंग
शब्द-सामर्थ्य और यथार्थ
आकलन, सामग्री और ब्रांडिंग
गोपाल मिश्रा
राष्ट्रीय अध्यक्ष IFWJ
समकालीन बाज़ार-संचालित अर्थव्यवस्था में ‘ब्रांडिंग’ पर आवश्यकता से अधिक बल दिया जा रहा है, और पत्रकारिता या मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। एक बड़े बाज़ार हिस्से (मार्केट शेयर) पर कब्ज़ा ज़माने के लिए मीडिया उत्पाद की ब्रांडिंग की ज़रूरत पर चर्चा करना और उस पर ज़ोर देना आम बात हो चुकी है। यहाँ तक कि एक पत्रकार या लेखक को भी स्व-प्रचार (प्रोजेक्शन) की आवश्यकता होती है, किंतु यह तर्कसंगत प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या विपणन (मार्केटिंग) केवल किसी उत्पाद या व्यक्ति विशेष की ब्रांडिंग पर ही निर्भर कर सकता है?
दिलचस्प बात यह है कि इस विमर्श की शुरुआत 'ब्रांडिंग' शब्द के मूल अर्थ से की जा सकती है, जो वस्तुतः भेड़ों की पहचान के लिए उन पर गर्म लोहे से दागकर चिन्ह बनाने से शुरू हुआ था, ताकि चरवाहा अपने रेवड़ की गिनती रख सके। आज के आधुनिक भारत में किसी सार्वजनिक हस्ती को उसकी राजनीतिक संबद्धता और वैचारिक एजेंडे के अनुसार चिन्हित या ‘ब्रांड’ किया जाता है। हाल के वर्षों में कुछ पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की पहचान भी तत्कालीन सरकार या विशिष्ट राजनेताओं के साथ जोड़कर देखी जाने लगी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह निकटता पत्रकार को प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने में सहायता करती है, या फिर वह सत्ताधीशों की ब्रांडिंग का एक लाचार औज़ार बनकर रह गया है? जब किसी पत्रकार को किसी राजनेता का महिमामंडन करने के लिए सामग्री तैयार करनी पड़ती है, तो अपनी विषय-सामग्री (कंटेंट) से समझौता करने के कारण उसे स्वाभिमान की हानि और ग्लानि उठानी पड़ती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो सामग्री (कंटेंट) और उसकी प्रस्तुति ही सत्ता में बैठे लोगों की सेवा में पत्रकार की दक्षता तय करती है। उपभोक्ता की भाँति भारत का आम नागरिक या मतदाता भी अत्यधिक सजग और महत्त्वाकांक्षी है। राजनीति में किसी ब्रांड को आगे बढ़ाने वाले विमर्श (नैरेटिव) समय के साथ निष्प्रभ हो जाते हैं, जिन्हें समर्पित मीडियाकर्मियों द्वारा निरंतर पुनर्निर्मित करने की आवश्यकता पड़ती है। दिलचस्प बात यह है कि 21वीं सदी की पहली तिमाही में, सत्ता की लालसा रखने वालों के लिए आर्थिक मुद्दे अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सके; अतः उनके लिए देशभक्ति और संप्रदायवाद की भावना भड़काकर काल्पनिक या अर्ध-सत्य की नींव पर गढ़े गए आख्यानों को गढ़ने वाले लोगों को नियुक्त करना स्वाभाविक था। निःसंदेह, इससे सत्तारूढ़ दल न केवल टिका रहा, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर पहुँचकर उसने उन व्यावसायिक घरानों को खुलकर लाभ पहुँचाया, जिन्होंने उसे सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने में सहायता की थी।
यदि पत्रकार वर्तमान राजनीतिक और आर्थिक प्रवृत्तियों को समझने के लिए स्वयं को परिपक्व कर पाते, तो सुशासन में आ रही विकृतियों और 'क्रोनी कैपिटलिज़्म' (सांठगाँठ वाले पूँजीवाद) के बढ़ते प्रभाव को प्रभावी चुनौती दी जा सकती थी। यह ठीक वैसा ही है जैसे बाज़ार में नकली उत्पादों की बाढ़ आ जाए और प्रशासन उन्हें रोकने में विफल रहे; दुर्भाग्यवश, पत्रकार भी इस तरह की चुनौतियों पर खरे नहीं उतर सके। उन्हें लोक नीति (पब्लिक पॉलिसी) से जुड़े मुद्दों से भली-भांति अवगत होना चाहिए था। आशंका यह है कि राजनीतिक विचारधारा से परे यदि राजनीतिक नेतृत्व की साख गिरती है और त्वरित सुधारात्मक कदम नहीं उठाए जाते, तो 150 करोड़ की जनसंख्या वाले इस विशाल देश का भविष्य अनिश्चितता और अंधकार में घिर सकता है।
वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच आशा की एक किरण यह है कि अत्याधुनिक संचार तकनीक के प्रसार से मीडिया सामग्री का उपभोक्ता (पाठक/दर्शक) अब पत्रकारों और यहाँ तक कि राजनेताओं से भी अधिक जागरूक हो गया है। आम जनता का निष्पक्ष सर्वेक्षण यह प्रकट कर सकता है कि देश के किसी भी भूभाग, भाषा या आर्थिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति अनेक स्रोतों से सूचनाएँ प्राप्त कर अपनी स्वतंत्र राय बना रहा है। वह हम पत्रकारों द्वारा निर्मित सामग्री का भी बारीकी से परीक्षण कर रहा है।
ब्रांडिंग और सामग्री (कंटेंट)
एक नए पत्रकार के रूप में जब कोई रिपोर्टर या उप-संपादक किसी प्रतिष्ठित एवं स्थापित प्रकाशन संस्थान में कार्य करना प्रारंभ करता है, तो उसे समाज में तत्काल स्वीकृति और सम्मान प्राप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ, यदि मीडिया प्लेटफॉर्म कोई विख्यात समाचार पत्र या न्यूज़ चैनल है, तो नवागंतुक को अपनी योग्यता सिद्ध करने से पूर्व ही ध्यान व प्रतिष्ठा मिलने लगती है। किंतु, यह स्थिति तब तक क्षणभंगुर बनी रहती है जब तक वह गुणवत्तापूर्ण सामग्री (कंटेंट) के निर्माण के प्रति समर्पित न हो। ध्यातव्य है कि यह नियम केवल पत्रकारों पर ही नहीं, बल्कि रंगमंच, सिनेमा और सार्वजनिक जीवन के व्यक्तियों पर भी समान रूप से लागू होता है।
अक्सर कहा जाता है कि मनोरंजन उद्योग की भांति पत्रकार, मीडियाकर्मी, अभिनेता और राजनेता भी पर्याप्त दृश्यता (एक्सपोज़र) के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकते; यह सच है कि प्रचार ही उन्हें अपनी पहचान या ब्रांड स्थापित करने में सक्षम बनाता है। फिर भी, किसी उत्पाद की भाँति यदि उनकी छवि उत्कृष्ट विषय-सामग्री से मेल नहीं खाती, तो पत्रकारिता और राजनीति सहित इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का पतन सुनिश्चित हो जाता है। समय रहते सुधारात्मक कदम न उठाने पर उनका वर्चस्व समाप्त हो जाता है, जिसके बाद उनके इतिहास का शोकलेख लिखने के लिए भी किसी कुशल लेखक की आवश्यकता पड़ती है।
तात्पर्य यह कि ब्रांड निर्माण के लिए किए जाने वाले अंधाधुंध प्रचार के आडंबर के पीछे विषय-सामग्री के रचयिता की भूमिका को छिपाया नहीं जा सकता। आज के संचार युग में सामग्री लेखक स्वयं भी लक्षित पाठकों व दर्शकों की पैनी दृष्टि से बच नहीं सकता। आधुनिक दौर में केवल खोखली ब्रांडिंग के भरोसे किसी पत्रकार, मीडिया प्लेटफॉर्म या राजनेता का टिके रहना संभव नहीं है। चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक, केवल सशक्त और प्रामाणिक सामग्री ही किसी संस्थान को स्थायित्व और दीर्घायु प्रदान कर सकती है।
संक्षेप में, एक पत्रकार या लेखक के रूप में किसी उत्पाद या व्यक्ति के प्रदर्शन का आकलन या प्रशंसा करते समय हमें अत्यंत सतर्क और विवेकशील रहने की आवश्यकता है।
सोशल मीडिया का प्रभाव
पत्रकारों और लेखकों को सोशल मीडिया के कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ते प्रभाव और विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उभार से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और भ्रामक सूचनाएँ फैलाने में इसका दुरुपयोग हो सकता है, किंतु यह प्रभाव अल्पकालिक ही होगा। ऐसी रिपोर्टें भी हैं कि कुछ राजनीतिक समूह एआई की सहायता से अश्लील व भ्रामक सामग्री प्रसारित करने के लिए छद्म सोशल मीडिया चैनल चला रहे हैं, लेकिन इनका असर भी क्षणिक ही रहेगा। अंततः केवल राजनीतिक लफ़्फ़ाज़ी में लिप्त रहने वाले लोग जनमानस के स्मृति-पटल से विलीन हो जाएँगे।
हाल के वर्षों में 'इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स' (IFWJ) को कई झटके लगे हैं। इसका मुख्य कारण यह गलतफहमी रही कि इसके सम्मान का उपयोग राजनीतिक पहुँच बनाने या सत्ता तंत्र का हिस्सा बनने के लिए किया जा सकता है। वास्तव में, भारतीय लोकतंत्र इस समय भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के शिकंजे में है; संसद और विधानसभाओं में ऐसे जनप्रतिनिधियों की बड़ी संख्या है जो हत्या और महिला उत्पीड़न जैसे गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को ऐसे दागी जनप्रतिनिधियों के मुकदमों की निगरानी के निर्देश दिए हैं, किंतु राज्य सरकारों की उदासीनता के कारण उनकी सजा में विलंब हो रहा है। इस परिदृश्य में मीडिया और IFWJ की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो जाती है। हमारे सदस्यों को देश भर में चल रहे इन मुकदमों की विस्तृत कवरेज करनी चाहिए। यदि स्थापित मीडिया घराने इन मुकदमों की रिपोर्टिंग से पीछे हटते हैं, तो सोशल मीडिया इसके लिए एक सशक्त माध्यम बन सकता है।
पत्रकारिता के मूल्यों का पुनर्जागरण
देश भर में हम में से प्रत्येक पत्रकार जनहित के लिए सत्य को उजागर करने हेतु प्रतिबद्ध एक सैनिक की भाँति है। यह आशा की जाती है कि हमारी रिपोर्टिंग और सामग्री निर्माण का मुख्य केंद्र उत्तरदायित्व तय करना होगा, जहाँ प्रशासनिक तंत्र और सरकारी अधिकारियों से जनसेवा करने व जनकल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर लागू करने के लिए प्रश्न पूछे जाएँ। अगस्त 2026 में, उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े जिले में कार्यरत वैज्ञानिकों के एक समूह ने मीडिया के सहयोग से स्थानीय प्रशासन को किसानों के हित में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। स्थानीय वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सुशासन की माँग उठाई है। इसी प्रकार, देश भर में जनहित से जुड़े मुद्दों को मीडिया के समर्थन की आवश्यकता है, जैसे बेंगलुरु में मेट्रो रेल नेटवर्क के निर्माण में हो रहा विलंब।
यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि हम सभी पत्रकार बोधगया में एकत्र हो रहे हैं। यहाँ हम अपने राष्ट्रीय ध्वज के प्रतीक ‘अशोक चक्र’ की प्रेरणा से प्रामाणिक एवं गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के संकल्प को पुनः प्रज्वलित करेंगे। यह चक्र धर्मनिष्ठ जीवन, नैतिक मूल्यों, न्याय और इस शाश्वत विचार का प्रतीक है कि प्रगति केवल गतिशीलता, परिवर्तन और कर्म पर निर्भर करती है। हम प्रार्थना करते हैं कि अशोक चक्र की 24 तीलियाँ हमारी प्राचीन विरासत, दार्शनिक परंपराओं और बौद्ध दर्शन के प्रतीकों को 21वीं सदी के आदर्शों के साथ जोड़कर भारतीय पत्रकारिता को एक नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करें।