पत्रकारों की सुरक्षा है लोकतंत्र की सुरक्षा? दिल्ली घटनाक्रम के बहाने IFWJ ने उठाए बड़े संवैधानिक सवाल
IFWJ स्थापना दिवस स्थगित: केवल कार्यक्रम नहीं, एक संदेश भी
पत्रकारों की सुरक्षा है लोकतंत्र की सुरक्षा? दिल्ली घटनाक्रम के बहाने IFWJ ने उठाए बड़े संवैधानिक सवाल
मारूफ रजा
(वरिष्ठ पत्रकार एवं अध्यक्ष जर्नलिस्ट यूनियन ऑफ दिल्ली [JUD])
दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिया जाना, मारपीट और उत्पीड़न की घटनाओं पर इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन ने पत्रकार सुरक्षा क़ानून, राष्ट्रीय पत्रकार रजिस्टर और कार्यरत पत्रकारों के लिए वैधानिक ढांचा बहाल करने की मांग दोहराई है। क्या यह केवल पत्रकारों का मुद्दा है या भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की नई परीक्षा? इस विशेष विश्लेषण में पढ़िए पूरी पड़ताल।
पत्रकारों पर कार्रवाई बनी लोकतंत्र की कसौटी? दिल्ली की घटनाओं ने क्यों छेड़ दी नई बहस
"लोकतंत्र की असली ताक़त संसद से पहले स्वतंत्र प्रेस में दिखाई देती है। जब कैमरे डरने लगें, क़लम लरज़ने लगें और लिखने वाले हाथ कांपने लगें, तब लोकतंत्र को अपने आईने में झांकना चाहिए।"
दिल्ली में अक्टूबर 2026 के प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों की हिरासत, मारपीट, उत्पीड़न और रिपोर्टिंग में बाधा डालने की घटनाओं को लेकर इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों की भूमिका केवल घटनाओं को रिकॉर्ड करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे जनता के "जानने के अधिकार" और सत्ता की जवाबदेही के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। यदि सार्वजनिक घटनाओं की कवरेज कर रहे पत्रकारों को उनकी पहचान बताने के बावजूद हिरासत में लिया जाए या उनके पेशेवर दायित्व में बाधा पहुंचाई जाए, तो यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। हालांकि IFWJ ने यह भी कहा कि न्यायालयों से जुड़े विवादों का समाधान कानूनी प्रक्रिया के भीतर होना चाहिए, लेकिन किसी भी परिस्थिति में प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लोकतांत्रिक समाधान नहीं हो सकता।
स्थापना दिवस स्थगित: केवल कार्यक्रम नहीं, एक संदेश भी
दिल्ली पुलिस और सरकार की एडवाइज़री को देखते हुए IFWJ ने 28 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित अपना राष्ट्रीय स्थापना दिवस समारोह स्थगित कर दिया। संगठन ने स्पष्ट किया कि देशभर के राज्य मुख्यालयों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जबकि राष्ट्रीय समारोह बाद में होगा। यह निर्णय सुरक्षा हालात को देखते हुए लिया गया, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश भी छिपा है कि जब पत्रकारों की सुरक्षा स्वयं चिंता का विषय बन जाए, तब उत्सव से पहले सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा अधिक आवश्यक हो जाती है।
महिला पत्रकारों की सुरक्षा: केवल संवेदना नहीं, संस्थागत जवाबदेही की ज़रूरत
फ़ेडरेशन ने महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न के आरोपों पर तत्काल एफ़आईआर, निष्पक्ष जांच, डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण और पीड़ितों को प्रतिशोध से सुरक्षा देने की मांग की है। संगठन का मानना है कि महिला पत्रकार यदि सार्वजनिक स्थानों पर निर्भय होकर रिपोर्टिंग नहीं कर पाएंगी, तो लोकतांत्रिक संवाद भी प्रभावित होगा। इसलिए ऐसे मामलों में क़ानून का तेज़ और निष्पक्ष हस्तक्षेप अनिवार्य होना चाहिए।
क्या भारत को अब राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा क़ानून की आवश्यकता है?
IFWJ का सबसे बड़ा आग्रह एक व्यापक पत्रकार सुरक्षा क़ानून को लेकर है। संगठन का कहना है कि आज पत्रकार केवल संघर्ष क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि चुनाव, अदालत, अपराध, सांप्रदायिक तनाव, प्राकृतिक आपदाओं और राजनीतिक आंदोलनों की रिपोर्टिंग के दौरान भी गंभीर जोखिम उठाते हैं। ऐसे में स्थायी, अनुबंधित, फ्रीलांसर, डिजिटल और क्षेत्रीय भाषा के पत्रकारों को समान कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। इसमें गैरक़ानूनी हिरासत, हमलों, धमकियों, उपकरणों की ज़ब्ती, निष्पक्ष जांच, पुलिस प्रोटोकॉल और मुआवज़े जैसी व्यवस्थाएं शामिल हों।
पत्रकार बनाम इन्फ्लुएंसर: बदलते मीडिया दौर की नई चुनौती
फ़ेडरेशन ने यह भी रेखांकित किया कि पुराने वर्किंग जर्नलिस्ट्स क़ानून समाप्त होने के बाद पत्रकारों की विशिष्ट वैधानिक पहचान कमज़ोर हुई है। डिजिटल मीडिया के विस्तार ने पत्रकार, कंटेंट क्रिएटर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के बीच की रेखा धुंधली कर दी है। इसी कारण संगठन ने राष्ट्रीय पत्रकार रजिस्टर की मांग दोहराई है। उसका कहना है कि यह किसी लाइसेंसिंग या सेंसरशिप का माध्यम नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी पारदर्शी सत्यापन व्यवस्था होनी चाहिए जो वास्तविक पत्रकारों की पहचान सुनिश्चित करे और उन्हें पेशेवर अधिकारों तथा सुरक्षा तक पहुंच दिला सके।
कार्यरत पत्रकार अधिनियमों की समाप्ति और वैधानिक ढांचे की बहाली
पत्रकारों और रील बनाने वालों एवं प्रभावकों (इन्फ्लुएंसरों) में अंतर कर पाने की कठिनाई एक नीतिगत विफलता भी है। दशकों तक कार्यरत पत्रकार अधिनियम, 1955 और कार्यरत पत्रकार (मज़दूरी की दरों का निर्धारण) अधिनियम, 1958 ने पत्रकारों को अलग वैधानिक पहचान दी और वेतन, सेवा शर्तों, अवकाश, ग्रेच्युटी तथा बकाया वसूली में संरक्षण प्रदान किया था। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-स्थिति संहिता, 2020 ने 21 नवंबर 2025 से दोनों अधिनियमों को निरस्त कर दिया। इससे पत्रकारिता एक सामान्य श्रम ढाँचे में आ गई, जिसमें वेतन संरक्षण, सेवा सुरक्षा या शिकायत निवारण के लिए पत्रकारिता-विशिष्ट कोई व्यवस्था नहीं है। यदि राज्य अपेक्षा करता है कि पुलिस, अदालतें और नियोक्ता पत्रकार और इन्फ्लुएंसर में भेद करें, तो उसे पहले ऐसा करने का वैध, पारदर्शी और एकसमान आधार उपलब्ध कराना होगा।
पत्रकारों का राष्ट्रीय रजिस्टर
(माननीय सर्वोच्च न्यायालय में व्यक्त इस भावना के संदर्भ में कि "पत्रकारों को रील बनाने वालों या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों से अलग पहचानना कठिन है।") IFWJ इसी कारण से लंबे समय से पत्रकारों के राष्ट्रीय रजिस्टर की मांग करता रहा है। यह लाइसेंसिंग, सेंसरशिप या राजनीतिक छंटनी का औज़ार नहीं बनना चाहिए। यह एक पारदर्शी, अधिकार-आधारित सत्यापन प्रणाली होनी चाहिए जो वैध पत्रकारों को राज्यों और प्लेटफ़ॉर्मों में पहचान दिलाए। इसमें शामिल होना चाहिए-
- एक विशिष्ट पत्रकार पहचान संख्या।
- किसी पंजीकृत मीडिया संगठन, प्रेस क्लब, मान्यता प्राप्त पत्रकार यूनियन से जुड़ाव या प्रलेखित स्वतंत्र कार्य का सत्यापन।
- स्टाफ़ पत्रकार, फ्रीलांसर, डिजिटल पत्रकार, फोटो-पत्रकार, कैमरा पर्सन, संपादक और क्षेत्रीय भाषा के संवाददाताओं की स्पष्ट श्रेणियां।
- गोपनीयता और डेटा संरक्षण के उपाय, अस्वीकृति के विरुद्ध अपील का अधिकार और समय-समय पर नवीनीकरण।
- ऐसा तंत्र जो केवल असत्यापित, पक्षपातपूर्ण या व्यावसायिक सामग्री निर्माण में लगे व्यक्तियों को पत्रकार-सुरक्षा का दावा करने से रोके।
यह रजिस्टर पुलिस, अदालतों और सरकारी विभागों को वास्तविक पत्रकारों की पहचान में मदद करेगा और प्रेस की स्वतंत्रता को केवल PIB मान्यता तक सीमित नहीं करेगा। यह सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही में उठी उस चिंता का भी समाधान करेगा कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों, फ्रीलांसरों, इन्फ्लुएंसरों और कंटेंट क्रिएटरों में अंतर करना कठिन है और अलग-अलग श्रेणियों को अलग सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है।
IFWJ नेतृत्व के वक्तव्य
IFWJ के अध्यक्ष गोपाल मिश्रा ने कहा कि दिल्ली की स्थिति और आधिकारिक एडवाइज़री को देखते हुए फ़ेडरेशन ने जंतर-मंतर पर 28 अक्टूबर का स्थापना दिवस कार्यक्रम स्थगित किया है, राज्य इकाइयां इसे अपने मुख्यालयों पर मनाएंगी और राष्ट्रीय समारोह बाद में होगा। उन्होंने महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न और धमकाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच, FIR के तत्काल पंजीकरण और निष्पक्ष एवं संवेदनशील जांच, तथा पत्रकार रिचा पराशर की शिकायत पर शीघ्र कार्रवाई की माँग की, जिसमें सीसीटीवी और डिजिटल साक्ष्यों का संरक्षण तथा प्रतिशोध से सुरक्षा शामिल है। उन्होंने पत्रकार सुरक्षा कानून, कार्यरत पत्रकारों के लिए वैधानिक ढांचे की बहाली और पत्रकारों के राष्ट्रीय रजिस्टर की IFWJ की मांगें भी दोहराईं।
उपाध्यक्षों उपेंद्र सिंह राठौर, मोहन कुमार, जी. भूपति और प्रेमकांत तिवारी ने कहा कि आधिकारिक एडवाइज़री को देखते हुए दिल्ली का कार्यक्रम ज़िम्मेदारी से स्थगित किया गया है, राज्य इकाइयां 28 अक्टूबर को अपने मुख्यालयों पर कार्यक्रम करेंगी और उसके बाद राष्ट्रीय आयोजन होगा। राठौर ने रिचा पराशर की शिकायत की निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित जांच की मांग की।
मोहन कुमार ने कहा कि महिला पत्रकारों की सुरक्षा और गरिमा पर कोई समझौता नहीं हो सकता, उत्पीड़न या धमकी के आरोप तुरंत दर्ज होने चाहिए और संवेदनशीलता से जांचे जाने चाहिए, तथा पराशर मामले का निर्णय कड़ाई से साक्ष्यों और कानून के अनुसार होना चाहिए। प्रेमकांत तिवारी ने कहा कि संज्ञेय अपराधों में FIR दर्ज करने में देरी गंभीर चिंता का विषय है, महिला पत्रकारों की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए और जांच राजनीतिक प्रभाव तथा चरित्र हनन से मुक्त रहकर होनी चाहिए। उपाध्यक्ष जी. भूपति ने कहा कि भारत को प्रिंट, प्रसारण, डिजिटल, फ्रीलांस और स्वतंत्र पत्रकारों को हिंसा, धमकी, गैरक़ानूनी निगरानी और प्रतिशोध से बचाने वाले व्यापक पत्रकार सुरक्षा क़ानून की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि IFWJ निरस्त हो चुके पुराने कार्यरत पत्रकार अधिनियम के स्थान पर नया वैधानिक ढांचा तथा पारदर्शी राष्ट्रीय पत्रकार रजिस्टर बनाने की मांग करता है, ताकि मान्यता और कल्याण सुनिश्चित हो सके। उन्होंने याद दिलाया कि ये मांगें 2016 में जैसलमेर, राजस्थान में संगठन के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. के. विक्रम राव द्वारा उठाई गई थीं।
सचिवों परमेश्वर राव और सौरव पटनायक ने भी सेवा शर्तों और मान्यता पर इन मांगों का समर्थन किया। परमेश्वर राव ने निरस्त हो चुके कार्यरत पत्रकार अधिनियम, 1955 के स्थान पर आज की मीडिया वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने वाले आधुनिक क़ानून की मांग की, जो डिजिटल, फ्रीलांस और स्वतंत्र मीडियाकर्मियों सहित सभी पत्रकारों की सेवा शर्तों, वेतन, गरिमा और पेशेवर स्वतंत्रता की प्रभावी संस्थागत और क़ानूनी सुरक्षा के साथ रक्षा करे। पटनायक ने कहा कि पारदर्शी मान्यता, कल्याण, बीमा, सुरक्षा और संस्थागत सहयोग के लिए पत्रकारों का राष्ट्रीय रजिस्टर आवश्यक है और इसे प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल तथा स्वतंत्र मीडिया को समेटते हुए निष्पक्ष, विवेकाधीन न होने वाली और अधिकार-आधारित प्रक्रिया से बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से बिना विलंब और बिना राजनीतिक विवेक के आगे बढ़ने का आग्रह किया।
28 अक्टूबर को राज्य मुख्यालयों पर स्थापना दिवस समारोह
IFWJ की राज्य इकाइयों के अध्यक्षों ने घोषणा की कि स्थापना दिवस 28 अक्टूबर को उनके अपने राज्य मुख्यालयों पर मनाया जाएगा, और बताया कि आधिकारिक एडवाइज़री को देखते हुए दिल्ली का केंद्रीय कार्यक्रम स्थगित किया गया है। दिल्ली इकाई के अध्यक्ष मारूफ़ रज़ा ने कहा कि राष्ट्रीय स्थापना दिवस कार्यक्रम की मेज़बानी दिल्ली को जंतर मंतर पर करनी थी, दिल्ली इकाई इसे अपने मुख्यालय पर मनाएगी और बाद में सभी राज्यों की भागीदारी के साथ एक सुरक्षित, समावेशी राष्ट्रीय समारोह आयोजित किया जाएगा। यह घोषणा उत्तर प्रदेश (हसीब सिद्दीक़ी), ओडिशा (मनोज दास), बिहार (प्रमोद दत्ता), त्रिपुरा (बिजॉय पॉल), आंध्र प्रदेश (एन. ईश्वर राव), तमिलनाडु (वी. सेल्विन विनोथ कुमार), कर्नाटक (शांता कुमारी), महाराष्ट्र (पंकज वर्मा), झारखंड (भरत भूषण), तेलंगाना (मामिडी सोमैया), मध्य प्रदेश (सलमान खान), पश्चिम बंगाल (अमित राय), असम (नमिता बोरा) और उत्तराखंड (अरुण शर्मा) की इकाइयों ने की।
रिचा पराशर की शिकायत पर उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तराखंड के अध्यक्षों ने निष्पक्ष, साक्ष्य-आधारित जांच की मांग की। आंध्र प्रदेश के एन. ईश्वर राव ने आश्वासन मांगा कि सच बोलने के कारण किसी पत्रकार को प्रतिशोध का सामना न करना पड़े। कर्नाटक की शांता कुमारी ने कहा कि महिला पत्रकार बिना भय के उत्पीड़न की रिपोर्ट कर सकें, यह सुनिश्चित होना चाहिए, और शिकायतों के शीघ्र पंजीकरण, निष्पक्ष एवं संवेदनशील जांच, साक्ष्य संरक्षण तथा प्रतिशोध, धमकी या चरित्र हनन से कड़ी सुरक्षा की मांग की।
पत्रकार सुरक्षा क़ानून पर ओडिशा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के अध्यक्षों ने मांग दोहराई। ओडिशा के मनोज दास ने कहा कि क़ानून को पत्रकारों को हिंसा, धमकी और प्रतिशोध से बचाना चाहिए, और विशेषकर ज़िलों व ग्रामीण क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा राज्य की प्राथमिकता बननी चाहिए। महाराष्ट्र से मुकेश सेठ ने कहा कि महाराष्ट्र की तरह पत्रकार सुरक्षा क़ाानून राष्ट्रीय स्तर पर भी बनाया जाना चाहिए, और पत्रकारों के लिए वैधानिक ढांचे की बहाली से हर पत्रकार को आधुनिक क़ानूनी सुरक्षा, उचित कार्य-स्थितियां और पेशेवर गरिमा मिलेगी। तमिलनाडु के.वी. सेल्विन विनोथ कुमार ने इस क़ानून, कार्यरत पत्रकारों के लिए वैधानिक ढांचे की बहाली और पत्रकारों के राष्ट्रीय रजिस्टर की IFWJ की मांगों की पुनः पुष्टि की।
पत्रकारिता के सभी रूपों को मान्यता देने वाला क़ानून बने
बिहार के प्रमोद दत्ता और मध्य प्रदेश के सलमान ख़ान ने पत्रकारिता के सभी रूपों को मान्यता देने वाले आधुनिक क़ानून की मांग की, जिसके तहत डिजिटल, फ्रीलांस और स्वतंत्र पत्रकारों को समान क़ानूनी सुरक्षा और मान्यता, उचित वेतन और कार्य-स्थितियां, नौकरी की सुरक्षा तथा उनकी पेशेवर स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा मिले।
त्रिपुरा, झारखंड और असम ने बिना विवेकाधिकार के बनाए गए पारदर्शी, अधिकार आधारित रजिस्टर का समर्थन किया। त्रिपुरा के बिजॉय पॉल ने कहा कि इससे सभी मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों के पत्रकारों के लिए मान्यता, कल्याण सहायता, बीमा, सुरक्षा उपाय और संस्थागत सहायता सुनिश्चित होनी चाहिए। झारखंड के भरत भूषण ने कहा कि दूरदराज़ और ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकारों को बिना भेदभाव के समान सुरक्षा, बीमा, सुरक्षा उपाय और संस्थागत सहायता मिलनी चाहिए। असम की नमिता बोरा ने कहा कि रजिस्टर में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और स्वतंत्र मीडिया तथा दूरदराज़ क्षेत्रों के पत्रकार भी शामिल होने चाहिए।
बड़ी तस्वीर: यह विवाद केवल पत्रकारों का नहीं, लोकतंत्र की विश्वसनीयता का है
IFWJ के राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पदाधिकारियों ने एक स्वर में कहा है कि पत्रकार सुरक्षा, सेवा अधिकारों की बहाली और राष्ट्रीय पत्रकार रजिस्टर जैसी मांगें किसी विशेष वर्ग को विशेषाधिकार देने के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए हैं। संगठन का मानना है कि यदि पत्रकार भयमुक्त होकर रिपोर्टिंग नहीं कर पाएंगे तो सबसे अधिक नुक़सान आम नागरिक के सूचना के अधिकार को होगा। इसलिए सरकार को केवल आश्वासनों से आगे बढ़कर ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करना चाहिए जो प्रेस की स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
Media24X7 विश्लेषण
दिल्ली की यह घटना केवल एक विरोध प्रदर्शन या पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं है। इसने भारतीय पत्रकारिता के सामने तीन मूलभूत प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या आज पत्रकारों की स्वतंत्र पहचान पर्याप्त रूप से संरक्षित है? क्या डिजिटल युग में पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर के बीच स्पष्ट क़ानूनी सीमा तय करने का समय आ गया है? और क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए भारत को एक आधुनिक पत्रकार सुरक्षा क़ानून की आवश्यकता है? इन प्रश्नों के उत्तर केवल किसी एक संगठन या सरकार को नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को देने होंगे।
"लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों से नहीं, बल्कि उन दिनों से होती है जब सत्ता के सामने खड़ा पत्रकार बिना डर के सवाल पूछ सके। क्योंकि जहां क़लम आज़ाद होती है, वहीं नागरिक सचमुच आज़ाद होता है।"
Link: https://media24x7india.com/article/ifwj-journalist-safety-law-delhi-protests-press-freedom-analysis-2026