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लहू से लिखी सुर्खियाँ: बिहार में पत्रकारों की शहादत और IFWJ का संघर्ष
September 17, 2026

लहू से लिखी सुर्खियाँ: बिहार में पत्रकारों की शहादत और IFWJ का संघर्ष

Mohan Kumar (मोहन कुमार)
Mohan Kumar (मोहन कुमार)
उपाध्यक्ष, इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ), बिहार
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लहू से लिखी सुर्खियाँ: बिहार में पत्रकारों की शहादत और IFWJ का संघर्ष

लेखक: मोहन कुमार, उपाध्यक्ष, इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ), बिहार


बिहार के सुदूर जिलों, प्रखंडों और ग्रामीण अंचलों में पत्रकारिता करना आज महज एक पेशा नहीं, बल्कि बारूद के ढेर पर खड़े होकर सच बोलने का एक खतरनाक संकल्प है। जब राज्य का प्रशासनिक ढांचा अवैध शराब माफिया, बालू-पत्थर सिंडिकेट, फर्जी मेडिकल रैकेट और राजनीतिक अपराधियों के गठजोड़ के आगे लाचार दिखने लगता है, तब निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने वाला जिला संवाददाता सबसे पहला निशाना बनता है। ग्रामीण भारत की आवाज़ बनने वाले ये स्ट्रिंगर और स्वतंत्र पत्रकार बिना किसी कॉर्पोरेट सुरक्षा या संस्थागत कवच के धरातल पर काम करते हैं। पिछले एक दशक में बिहार की माटी ने दर्जनों साहसी पत्रकारों का रक्त बहते देखा है, जिन्होंने सत्ता के गलियारों से ज्यादा गलियों के सच को प्राथमिकता दी। ऐसी विषम परिस्थितियों में 'इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स' (IFWJ) ने न केवल एक पेशेवर मंच के रूप में, बल्कि एक जुझारू ट्रेड यूनियन के रूप में यह जिम्मेदारी उठाई है कि किसी भी साथी की शहादत व्यर्थ न जाए।

बिहार में पत्रकार हत्याओं का सिलसिला

बिहार में पत्रकारों की हत्या का पैटर्न अक्सर एक जैसा होता है: पहले धमकी, फिर प्रशासनिक उपेक्षा और अंततः एक जघन्य हत्याकांड। मुजफ्फरपुर जिले में 26 जून 2024 को 48 वर्षीय वरिष्ठ हिंदी पत्रकार शिवशंकर झा की अवैध शराब माफिया द्वारा चाकू से गोदकर की गई हत्या ने इस कड़वे सच को एक बार फिर उजागर किया। इस घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था। IFWJ के प्रतिनिधिमंडल ने तत्काल घटनास्थल पर पहुँचकर स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता के विरुद्ध मोर्चा खोला। हमने राज्य के पुलिस महानिदेशक और गृह विभाग को यह स्पष्ट चेतावनी दी कि केवल 'प्यादों' की गिरफ्तारी से इंसाफ नहीं होगा; जब तक मुख्य सरगनाओं के चेहरे बेनकाब नहीं होते, संघर्ष जारी रहेगा। संघ ने न केवल पीड़ित परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता दी, बल्कि सरकार पर दबाव बनाकर आश्रित के लिए सरकारी नौकरी और 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग को प्रशासनिक प्राथमिकता बनवाया। इसी कड़ी में जुलाई 2024 में डिजिटल मीडिया के युवा पत्रकार गौरव कुशवाहा की संदेहास्पद मौत पर भी IFWJ ने पुलिस की 'लीपापोती' का पर्दाफाश किया और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।

बिहार के अन्य जिलों से आने वाली खबरें और भी वीभत्स हैं। अगस्त 2023 में अररिया जिले में “दैनिक जागरण” के वरिष्ठ संवाददाता विमल कुमार यादव की उनके घर के बाहर सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। विमल जी की शहादत का कारण उनका अटूट साहस था; वे अपने भाई के हत्याकांड में मुख्य गवाह थे और अपराधियों की धमकियों के आगे झुकने को तैयार नहीं थे। IFWJ ने इसे राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता घोषित किया और पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन किए। हमने आईजी और एसपी स्तर के अधिकारियों से लड़ाई लड़ी ताकि मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में हो और उनके परिजनों को चौबीसों घंटे सुरक्षा मिले।

इसी तरह, मई 2022 में बेगूसराय के बखरी में पंचायत चुनाव और शराब तस्करी की रिपोर्टिंग करने वाले सुभाष कुमार महतो को बदमाशों ने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। IFWJ की जिला इकाई ने समाहरणालय का घेराव कर पुलिस को त्वरित कार्रवाई के लिए बाध्य किया, जिसके परिणामस्वरूप मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी संभव हो सकी। वहीं, पूर्वी चंपारण में अगस्त 2021 में “सुदर्शन टीवी” के युवा पत्रकार मनीष कुमार सिंह का क्षत-विक्षत शव जब एक पोखरे से बरामद हुआ, तो पुलिस ने इसे 'हादसा' बताने की कोशिश की। लेकिन IFWJ के कड़े हस्तक्षेप और आंदोलनात्मक दबाव के कारण गहन जांच हुई और नामजद अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा गया।

सबसे हृदयविदारक मामला मधुबनी के बेनीपट्टी का था, जहाँ नवंबर 2021 में स्वतंत्र पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता बुद्धिनाथ झा उर्फ अविनाश की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई। बुद्धिनाथ ने अवैध नर्सिंग होम और फर्जी मेडिकल क्लीनिकों के काले साम्राज्य का पर्दाफाश किया था, जिसके प्रतिशोध में उनका अपहरण कर उन्हें जिंदा जला दिया गया। इस अमानवीय कृत्य ने संपूर्ण मानवता को शर्मसार किया। IFWJ ने पूरे मिथिलांचल में एक जनांदोलन खड़ा किया, जिससे दबाव में आए प्रशासन को विशेष जांच दल (SIT) गठित करना पड़ा और कई रसूखदार क्लीनिक संचालकों को जेल जाना पड़ा।

बिहार में पत्रकारों पर हमलों का इतिहास केवल व्यक्तिगत रंजिश नहीं, बल्कि संगठित अपराध का प्रतिशोध रहा है। मार्च 2018 में भोजपुर जिले में “दैनिक भास्कर” के पत्रकारों नवीन निश्चल और विजय सिंह की बाइक को एक पूर्व मुखिया की एसयूवी से कुचलकर उनकी हत्या कर दी गई। पुलिस इसे एक सामान्य सड़क दुर्घटना बताकर रफा-दफा करना चाहती थी, लेकिन IFWJ की टीम ने जमीनी पड़ताल कर यह साबित किया कि यह एक सुनियोजित हत्या थी। समाहरणालय के समक्ष अनिश्चितकालीन धरने के बाद पुलिस को आईपीसी की धारा 302 के तहत मामला दर्ज करना पड़ा। इसी तरह, रोहतास के सासाराम में नवंबर 2016 में “दैनिक भास्कर” के धर्मेंद्र सिंह की हत्या खनन माफिया ने की थी। धर्मेंद्र जी ने अपनी जान के खतरे की सूचना पुलिस को दी थी, फिर भी उन्हें नहीं बचाया गया। IFWJ ने इस लापरवाही के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया और राज्य स्तर पर प्रदर्शन किए, जिसके परिणामस्वरूप मुख्य शूटरों को सजा मिली।

सीवान में मई 2016 में “हिन्दुस्तान” के ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन की सरेराह हत्या बिहार की पत्रकारिता के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। बाहुबली नेताओं और आपराधिक सिंडिकेट के खिलाफ उनकी निडर कलम ही उनकी मौत का कारण बनी। IFWJ उन अग्रणी संगठनों में था जिसने स्थानीय पुलिस की जांच को खारिज कर सीबीआई (CBI) जांच की पुरजोर मांग की। संघ ने राजदेव जी की पत्नी आशा रंजन जी को सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी लड़ाई में नैतिक और संगठनात्मक संबल दिया। नौ साल के लंबे संघर्ष के बाद, अगस्त-सितंबर 2025 में मुजफ्फरपुर की विशेष सीबीआई कोर्ट ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह जीत केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा से काम करने वाले हर पत्रकार की जीत थी।

इन चर्चित मामलों के अलावा, समस्तीपुर के ब्रजेश कुमार, खगड़िया के गोकुल यादव और राज्य के विभिन्न कोनों के स्थानीय रिपोर्टरों तथा छायाकारों पर हुए अनगिनत हमलों में IFWJ हमेशा पहली ढाल बनकर खड़ा रहा है। संघ के लिए किसी राष्ट्रीय दैनिक का ब्यूरो चीफ और किसी दूरस्थ गाँव का अंशकालिक स्ट्रिंगर पूरी तरह समान हैं।

IFWJ के तीन प्रमुख मोर्चे व माँगें :

इन तमाम त्रासदियों ने एक गंभीर व्यवस्थागत संकट को उजागर किया है। मीडिया घरानों द्वारा जिला और प्रखंड स्तर के पत्रकारों को पहचान पत्र तो दे दिए जाते हैं, लेकिन जब बात सुरक्षा, बीमा या विधिक सहायता की आती है, तो वे खुद को अकेला पाते हैं। इस शोषणकारी चक्र को तोड़ने के लिए IFWJ तीन मुख्य मोर्चों व माँगों पर संघर्षरत है:

  1. 'पत्रकार सुरक्षा कानून' की मांग - हम बिहार सरकार से महाराष्ट्र की तर्ज पर एक कठोर और गैर-जमानती पत्रकार सुरक्षा अधिनियम लागू करने की मांग कर रहे हैं। हमारा प्रस्ताव है कि पत्रकारों पर हमला गैर-जमानती अपराध हो, धमकियों पर तत्काल अनिवार्य सुरक्षा मिले और मुकदमों का निपटारा छह महीने के भीतर फास्ट-ट्रैक कोर्ट में हो।
  2. विधिक और आपातकालीन सहायता - ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा पत्रकारों पर झूठे मुकदमे लादने की प्रवृत्ति बढ़ी है। IFWJ का राज्यस्तरीय विधिक प्रकोष्ठ ऐसे साथियों को मुफ्त कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान करता है और हमारा “आपातकालीन कल्याण कोष” प्रभावित परिवारों को त्वरित राहत पहुँचाता है।
  3. मीडिया घरानों की जवाबदेही - बड़े समाचार पत्र और चैनल अक्सर स्ट्रिंगरों का उपयोग करते हैं, लेकिन उन्हें बुनियादी अधिकार नहीं देते। हम श्रम आयोग पर दबाव बना रहे हैं कि न्यूनतम वेतन, जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा को वैधानिक रूप से अनिवार्य किया जाए।

पत्रकारिता लोकतंत्र की प्राणवायु है। जब एक पत्रकार का खून बहता है, तो केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र का एक स्तंभ कमजोर होता है। बिहार की धरती पर सच लिखने की कीमत अपने जीवन से चुकाने वाले शहीद साथियों की कुर्बानियों को व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा। IFWJ का संदेश स्पष्ट है: सत्ता, शासन और माफिया चाहे कितने भी ताकतवर क्यों न हों, कलम की आजादी पर हमला करने वालों के खिलाफ हमारी कानूनी और मैदानी जंग तब तक जारी रहेगी, जब तक बिहार का अंतिम पत्रकार सुरक्षित महसूस न करे और उसे न्याय न मिल जाए।